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समशेरा भी निकली डब्बा गुल फिल्म।

Sanjay Dutt was upset about the fight scene with Ranbir Kapoor, BTS video surfaced

आखिर खार हो क्या रहा है हमारे बॉलीवुड सिनेमा को , इस तरह से तोह हम कही के भी नहीं रह जाएंगे। कब तक हम अपने आप को देखा देतें रहेंगे।
बताओ फिर से लूट मची है, क्रोरोरे रुपये की फिल्म इस तरह से बना रहे है, और फिर औंधी मुँह गिर टी है ये फिल्म। कुछ भी कहानी है।
अरे भाई मुझे कोई बताएगा के आखिर हो क्या रहा है इंडियन सिनेमा को। ऐसा तोह नहीं है की हमने इस तरह की फिल्में पहले कभी नहीं देखि ,
अगर आप में से मुझे कोई यह बैठा दे की ये फिल्म एकदम नयी कहानी है। हद पार हो चूका है अब।
एंटेरतीयंमेंट एक्सप्रेस किसी को भी नहीं छोड़ेगा अगर किसी को लगता है के बड़े बड़े स्टारकास्ट को लेकर हम ऑडियंस की आँखो में धूल जोके सकतें है , तोह ऐसा नहीं होगा।
मैंने दुनिया की ऐसी कोई फिल्म नहीं छोड़ी होगी अपनी जीवन काल में, इंग्लिश , हिंदी, मराठी, बंगाली, कोरियाई, इतालियन, चीनी, फ्रेंच, साउथ सिनेमा और भी कई भाषाओं में मैंने फिल्मे देखीं है , में आपको बता दू के हर फिल्म से प्रेरित हु, और times of इंडिया ,cnn ibn bloomberg जैसे प्रेस में काम कर चूका हु।
में कोई हवा में बात नहीं करूँगा अगर फिल्म गलत है तोह गलत है।
बाकी आपकी मर्ज़ी आप देखें ऐसी फिल्म और डुबाये मल्टीप्लेक्स में अपने पैसे.

शमशेरा (रणबीर कपूर), एक आदिवासी नेता, जो अपने लोगों के साथ अपनी मिट्टी से उखड़ गया, अमीरों की संपत्ति को लूटने के लिए मजबूर है, जो खुद को एक उच्च जाति मानते हैं। शुद्ध सिंह (संजय दत्त), ब्रिटिश सेना का एक भारतीय अधिकारी, शमशेरा के भरोसे को धोखा देता है, और उसके साथ अपने कबीले को गुलाम बना लेता है। जबकि शमशेरा अपने कबीले को अंग्रेजों और उच्च जाति के लोगों के दोहरे चंगुल से मुक्त करने की कोशिश में अपनी जान गंवा देता है, उसका बेटा बल्ली (रणबीर, फिर से) 25 साल बाद इस विद्रोह के लिए अपना जीवन समर्पित कर देता है। वह अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने और अपने कबीले को मुक्त करने में कैसे सफल होता है, यह कहानी की जड़ है।
पहले फ्रेम से, बैकग्राउंड स्कोर और स्लीक वीएफएक्स के नेतृत्व वाले दृश्य आपको 1800 के दशक के अंत में भारत में बनाई गई इस काल्पनिक दुनिया में ले जाते हैं। जनजाति की जड़ों और उनके कारणों के लिए एक त्वरित, हास्य-पुस्तक शैली के संदर्भ को उधार देने के बाद, फिल्म शमशेरा की कहानी में डूब जाती है। यहीं से फिल्म की रफ्तार धीमी होने लगती है। और लगातार इसलिए, यह एक धीमी गति से चलने वाली एक्शन-ड्रामा बनी हुई है, जिसमें एक जाति के नेतृत्व वाली लड़ाई, एक रोमांटिक कोण के साथ एक बदला लेने की साजिश और ब्रिटिश राज के साथ टकराव शामिल है।
फिल्म के बारे में ज्यादा जानकारी दिए बिना कहा जा सकता है कि फिल्म के अंत तक आप थक चुके होंगे। फिल्म अपनी वेफर-पतली कहानी के लिए बहुत अधिक खिंची हुई महसूस करती है – वास्तव में, यह कुछ मामूली, लेकिन अस्वीकार्य तकनीकी खराबी के साथ रनटाइम के माध्यम से क्रॉल करती है। कहा जा रहा है कि, रणबीर कपूर और संजय दत्त इस नाटक के प्राण हैं। कमजोर कहानी और कमजोर पटकथा और संवादों के बावजूद, अभिनेता ईमानदार प्रदर्शन करते हैं
फिल्म की एक्शन कोरियोग्राफी, खासकर इंटरवल पॉइंट से पहले के सीन में और क्लाइमेक्स के कुछ हिस्सों में, बहुत अच्छी तरह से की गई है। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी, बैकग्राउंड स्कोर और वीएफएक्स फिल्म के मुख्य आकर्षण हैं।
संक्षेप में कहें तो, निर्देशक और सह-लेखक करण मल्होत्रा ​​निश्चित रूप से शुरुआत में एक भव्य दृष्टि रखते थे, लेकिन ऐसा लगता है कि उनके निष्पादन ने उन्हें धोखा दिया है। पैमाने, कैनवास और निर्माताओं के पास प्रतिभा को देखते हुए, हम केवल यह चाहते हैं कि यह सब एक साथ बेहतर ढंग से देखा गया हो जो एक ने देखा था।

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